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हर्बल जोन : जब फूलों से बनते थे रंग तब तन के साथ मन को भी मिलता था सुकून


हर्बल जोन : जब फूलों से बनते थे रंग तब तन के साथ मन को भी मिलता था सुकून


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   एक वह भी समय था, जब होली का मतलब रंगों की उन्मुक्त उड़ान नहीं बल्कि फूलों की खुशबू से भरी एक औषधीय अनुभूति थी, तब हवा में उड़ता हुआ हर रंग किसी जड़ी बूटी का स्पर्श लिए होता था और त्वचा पर पड़ने वाला हर कण शरीर को स्वस्थ बनाने का एक मौन उपचार होता था। उस समय होली केवल एक उत्सव भर नहीं थी, वह तन के साथ मन का भी विरेचन करती थी। भारत की प्राचीन परंपरा में होली के रंग पलाश, गुलाब, गेंदा, हल्दी और नीम जैसे फूलों व जड़ी-बूटियों से बनते थे। इनमें सबसे प्रमुख या रंगों का सबसे बड़ा स्रोत पलाश फूल और हल्दी होती थी। पलाश के फूल को आज भी कई जगहों पर होली का फूल ही कहा जाता है। इसके चमकीले केसरिया फूलों को सुखाकर या पानी में उबालकर इसका रंग बनाया जाता था। यह रंग त्वचा को नुकसान पहुंचाना तो छोड़िये अत्यंत लाभ पहुंचाता था। इसी तरह गुलाब की पंखुड़ियों से बना गुलाबी रंग त्वचा को ठंडक देने के साथ-साथ उसे चमकदार भी बनाता था। त्वचा में बहुत गहरे तक नमी बनाये रखता था और गेंदे के फूलों से बना गुलाबी और पीला रंग त्वचा को वो पोषण देता था, जो तमाम सप्लीमेंट भी मिलकर आज नहीं दे पाते। हल्दी का तो कहना ही क्या, वह तो हर बीमारी की औषधि है और शरीर को स्वस्थ व समृद्ध करती है। इस तरह प्राचीनकाल में होली सिर्फ त्योहार नहीं तन के साथ मन का पंच कर्म होती थी। तब हवा में उड़ते हुए ये प्राकृतिक रंग वातावरण को भी खुशनुमा बना देते थे और होली के उत्सव को कई गुना ज्यादा बढ़ा देते थे। लेकिन आज के रासायनिक रंगों में होली की पूरी अवधारणा ही बदल दी है। समय के साथ बाजार में सस्ते और चमकीले रासायनिक रंग आए हैं, जिससे होली उल्लास से कहीं ज्यादा बीमारी का सबब बन गई है। क्योंकि इन रासायनिक रंगों से कई तरह की परेशानियां और शारीरिक व्याधियां घेर लेती हैं। इनसे त्वचा में जलन होना, एलर्जी होना और संक्रमण होना आम बात है। आंखों को तो ये करीब-करीब सभी रंग नुकसान पहुंचाते हैं। शायद यही कारण है कि आज फिर से सभी बड़े शहरों में उच्च आयवर्ग वाले घरों में फूलों वाली होली लौट रही है। मथुरा और वृंदावन में तो हमेशा से फूलों वाली होली का चलन था। लेकिन हाल के दशकों में बाकी जगहों की तरह यहां भी मिट्टी, कीचड़ और रासायनिक रंगों का बोलबाला हो गया था। लेकिन अब कई धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन मथुरा और वृंदावन से होली के कृत्रिम रंगों को दूर कर रहे हैं और होली आने के कई महीनों पहले से ही यहां कई तरह के प्राकृतिक रंग फूलों और जड़ी-बूटियों से बनने शुरू हो जाते हैं, जो यहां तो इस्तेमाल होते ही हैं, देश और दुनिया के अलग-अगल हिस्सों में एक्सपोर्ट भी किए जाते हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी हाल के सालों में प्राकृतिक फूलों और जड़ी-बूटियों से रंग बनाकर कमाई करने का एक शानदार तरीका उभरा है और फिर से फूलों वाली होली की मजबूत पटकथा लिख रहा है।

   फूलों से मनायी जाने वाली होली केवल अतीत की एक सुंदर स्मृतिभर नहीं हैं बल्कि आज के इस बेहद अस्वस्थ माहौल में स्वस्थ होली का एक टिमटिमाता हुआ विकल्प है, जो हमें याद दिलाता है कि होली के उत्सव का आनंद तभी सही से लिया जा सकता है, जब इसके रंग शरीर को नुकसान न पहुंचाकर शरीर में स्वास्थ्य और ऊर्जा में वृद्धि करें और यह तभी संभव है, जब होली में खेले जाने वाले रंग प्राकृतिक फूलों और जड़ी-बूटियों से बनें। जब फूलों के रंगों से होली का धमाल मचता था, तब चेहरे बदरंग नहीं होते थे बल्कि दमक उठते थे। हमारा जीवन स्वास्थ्य और सुगंध से संतुलन हासिल कर लेता था। इसलिए आज फिर से आवश्यकता उसी परंपरा की होली को दोबारा से शुरू करने की है।


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